वाह री दिल्ली सरकार: इमामों को वेतन और मदरसों के शिक्षकों को …. ?


मो. अनस सिद्दीकी
नई दिल्ली। गत दिनों दिल्ली सरकार ने दिल्ली वक्फ बोर्ड के अधीन तमाम दिल्ली की मस्जिदों और वह मस्जिदें भी जो वक्फ बोर्ड के अंतर्गत नहीं आती उन तमाम इमामों की तनख्वाह तय करते हुए उसमें बड़ा इजाफा किया इजाफा कर एलान करने के बाद दिल्ली सरकार के मंत्री ने इमामों से कहा कि वह अब तो दिल्ली सरकार की हिमायत में मुसलमानों से वोट देने की अपील करें।
गौरतलब है कि अभी तक दिल्ली सहित तमाम देश के मदरसों पर आरोप लगता रहा है कि वहां पर पढ़ने वाले तमाम छात्रों को आतंकवादी प्रशिक्षण दिया जाता है अथवा जो आतंकवादी पकड़े जाते हैं वह कहीं ना कहीं किसी मदरसे से शिक्षा प्राप्त किये होते हैं। उनको जिहादी प्रशिक्षण दिया जाता है। जिसकी वजह से मदरसों में पढ़ने वाला तुलबा (छात्र) आसानी से अपनी जान देने को तैयार हो जाता है। यह एक ऐसा झूठ फैलाया गया कि यह झूठ आर.एस.एस और उसके अन्य सहयोगी संगठनों ने फैलाया। जिससे कि मुसलमानों को बदनाम किया जा सके साथ ही यह भी प्रचारित किया गया कि ’माना कि तमाम मुसलमान आतंकवादी नहीं है, लेकिन पकड़ा गया हर आतंकवादी मुसलमान था’। अब ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि दिल्ली सरकार ने इमामों के वेतन में बढ़ोत्तरी की और उनका वेतन फरवरी माह 2019 से ही लागू कर दिया गया। लेकिन मदरसों में पढ़ाने वाले तमाम मुदर्रिस अर्थात शिक्षक उनके वेतन की किसी को चिंता नहीं है। आज की कमर तोड़ महंगाई के दौर में भी वह केवल 5000 रूपये महीने का वेतन पाकर बच्चों को शिक्षा मुहैया करा रहे हैं। जबकि उन शिक्षकों का वेतन सबसे ज्यादा होना चाहिए था। ताकि वह दिल्ली में दूसरी राजभाषा उर्दू और मुसलमानों की आने वाली पीढ़ियों की सेवा सच्चे मन और लगन से कर सके। सरकार ने इमामों का वेतन बढ़ाया लेकिन देश का भविष्य संवारने वाले शिक्षकों को नजर अंदाज किया। सियासी पार्टियों को लगता है मुसलमानों के वोटो को बांटने अथवा दिलवाने में इमामों की भूमिका अहम होती है। इसलिए तमाम सियासी पार्टियों के नेता मस्जिदों में जाते हैं। मस्जिदों में चंदा देते हैं और अपने-अपने दल की हिमायत में मुसलमानों से वोट देने की अपील करवाते हैं। जबकि मस्जिदों के निर्माण कार्य में लगने वाले तमाम चंदा हर किसी व्यक्ति से नहीं लिया जा सकता है। क्योंकि मस्जिद में वही पैसा लग सकता है जो हलाल कमाई का हो, नेताओं की कमाई के बारे में अल्लाह ही बेहतर जानता है कि वह कितना हलाल का होता है। इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि देश के निर्माणकर्ता, देश के भविष्य को संवारने वाले मदरसों के शिक्षकों तथा शिशु मंदिरों में पढ़ाने वाले तमाम शिक्षकों को आत्मनिर्भर होने की दिशा में एक पहल करनी चाहिए। मदरसों और शिशु मंदिरों सहित सभी शिक्षकों को उनके बेहतर जीवन यापन के लिए एक अन्य सामान्य अध्यापकों के बराबर उनको भी वेतनमान दिया जाए। ताकि वह शिक्षक समाज में आत्मसम्मान के साथ अपना जीवन यापन कर सकें। सच्ची लगन के साथ बच्चों को शिक्षित कर देश की सेवा के लिए प्रेरित कर सकें। दिल्ली सरकार को अपनी शिक्षा नीति में सुधार करते हुए मुसलमानों के प्रति करनी और कथनी दोनों में समानता लानी होगी। तभी मुसलमानों की सच्ची हितैषी पार्टी साबित हो सकती है। जिस तरह से दिल्ली के शिक्षामंत्री मनीष सिसोदिया ने दिल्ली सरकार के अधीन स्कूलों को मॉडर्न एजुकेशन के नाम पर अंतरर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार भवन निर्माण, शिक्षा सामग्री, उच्च शिक्षा प्राप्त अध्यापक तैनात किए हैं। उसी प्रकार मदरसों में भी यह नियम, गुणवत्ता, उच्च शिक्षा प्राप्त मुदर्रिस पढ़ाने वाले अध्यापकों की ओर ध्यान क्यों नहीं दिया। क्या इसलिए कि मदरसों में पढ़ाने वाले अध्यापक उनकी पार्टी के समर्थन में वोट देने की अपील, वोटों को डाइवर्ट करने की क्षमता उनमें नहीं होती। इसलिए उनके वेतनमान की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। दिल्ली वक्फ बोर्ड का मुसलमानों के द्वारा ही या यूं कहें दिल्ली वक्फ बोर्ड के चेयरमैन के रूप में मुसलमान को नियुक्त किया जाता है। वक्फ बोर्ड के अधिकांश चेयरमैन अपने और अपने अजीज मित्रों, परिजनों के लिए ही काम करते है। उनका विकास करवाते हैं। वक्फ बोर्ड की संपत्तियों को खुर्द-बुर्द किया गया है। वक्फ बोर्ड का गठन जिन उद्देश्य के लिए किया गया था वह उन उद्देश्यों से भटक चुका है। वक्फ बोर्ड के चेयरमैन और दिल्ली सरकार को चाहिए कि वह ईमानदारी के साथ वक्फ के उद्देश्यों की पूर्ति करते हुए गरीब, मजलूमों, यतीम मिस्कीन और विधवाओं के उद्धार और विकास के लिए वह वक्फ की संपत्ति का उपयोग करें। ताकि इस्लाम का सच्चा और सही बराबरी का अधिकार, सामाजिक न्याय व्यवस्था लागू की जा सके। दिल्ली वक्फ बोर्ड किसी भी पार्टी के लिए उनका खिलौना ना बने। वक्फ बोर्ड के गठन से लेकर मौजूदा समय तक तय देखा गया है कि अधिकांश वक्फ बोर्ड के चेयरमैनों ने वक्फ बोर्ड को मजबुत एवं स्वावलंबी बनाने के नाम पर संपत्तियों को पूंजीपतियों और भूमाफियाओं को कोड़ी के भाव देकर केवल वक्फ संपत्तियों को खुर्द-बुर्द ही किया है। वक्फ बोर्ड में लीगल सेल में कार्यरत ज्यादातर अधिवक्ता वक्फ बोर्ड की संपत्तियों को लेकर विभिन्न अदालतों से न्याय दिलवाने में नाकाम ही रहे है। दिल्ली में कहने को तो मुलमानों की आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक स्थिति और विकास के लिए दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग, उर्दू अकादमी, दिल्ली वक्फ बोर्ड आदि बने हुए है। लेकिन इनके द्वारा मुसलमानों को भला कम और सरकार की चमचागीरी ज्यादा होती रही है। साल में एक बार उर्दू अकादमी के माध्यम से रोजा इफ्तार पार्टी, मुशायरा आदि करवाकर मुसलमानों पर अहसान किया जाता रहा है। जबकि दिल्ली सरकार को चाहिए िकवह मदरसों में पढ़ाने वाले शिक्षकों के वेतन का भी ध्यान रखती। सवाल यह भी है कि दिल्ली में भारी संख्या में शिया समुदाय के लोग भी है। लेकिन उनकी मस्जिदें वक्फ बोर्ड के अधीन नहीं है और उनके इमामों को भी दिल्ली सरकार बाकी के इमामों की तरह उनको बढ़ा हुआ वेतन तो क्या उनकी ओर तवज्जों ही नहीं दे रही है। क्या दिल्ली के शिया मुसलमान नहीं है! देश की तमाम सियासी पार्टियां मुसलमानों को भीख नहीं बल्कि अब सत्ता में संख्या के अनुपात में भागीदारी देने का लोकसभा चुनाव 2019 में अपने-अपने घोषणा पत्रों में उल्लेख करें।


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