लोग क्यों भाग रहे है खबरिया चैनलों से


जयशंकर गुप्त
हम आमतौर पर खबरिया टीवी चैनल नहीं देखते। कुछ खास ब्रांड के चैनल तो कभी नहीं देखते। तब भी कम ही देखते थे जब टीवी चैनलों पर विशेषज्ञ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक के रूप में चर्चा पर भाग लेने जाते थे। किसी ने वीडियो क्लिप भेज दी तो देख लेते और यदा कदा उसे साझा भी कर देते थे। अभी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो क्लिप में रिपब्लिक भारत के मालिक संपादक, जिन्हें कुछ लोग बार्किंग ऐंकर भी कहते हैं, अरनब गोस्वामी की कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बारे में पत्रकारिता की मर्यादा को तार तार करनेवाली भाषा सुनकर अपने पत्रकार होने पर ही शर्मिंदा महसूस कर रहा हूं।  हम कभी कांग्रेसी नहीं रहे, एक जमाने में धुर समाजवादी और धुर कांग्रेस विरोधी भी रहे हैं। लेकिन मेरा मानना है कि अरनब ने सोनिया गांधी के रूप में न सिर्फ एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल की अध्यक्ष और संसद सदस्य बल्कि भारत की बहू, भारतीय नागरिक और नारी शक्ति का अपमान किया है। एक ऐसी महिला का अपमान किया है जिसकी सास और पति ने इस देश की एकता और अखंडता के लिए शहादत दी है।
लोकतंत्र में एक पत्रकार को भी किसी दल और उसके या उसकी नेता से सहमत, असहमत होने, उसकी कठोरतम आलोचना करने का अधिकार होता है लेकिन किसी के विरुद्ध गाली गलौज, और अपशब्दों के जरिए हेट स्पीच देना, निंदा अभियान चलाना पत्रकारिता नहीं है। लेकिन अरनब यह काम लगातार करते आ रहे हैं, बांद्रा रेलवे स्टेशन पर प्रवासियों की जमा भीड़ और पालघर जिले में भीड़ द्वारा दो निरीह और निरपराध साधुओं और उनके ड्राइवर की नृशंस हत्या के मामले में तथ्यों से परे चीख- चिल्लाकर सांप्रदायिकता का जहर परोसना उनकी ‘यूएसपी’ बन गई है। दुर्भाग्यवश खबरिया चैनलों पर फेक न्यूज अथवा हेट स्पीच करने, दिखानेवालों पर कार्रवाई के लिए कोई ठोस मेकेनिज्म नहीं है। जो हैं भी वे दंतहीन संकाय हैं जिनके पास अपने फैसले लागू करवा पाने की क्षमता भी नहीं है। अदालतें कुछ कर सकती हैं!
सोनिया गांधी के बारे में रिपब्लिक भारत पर अरनब गोस्वामी की भाषा को देख सुनकर आप भी उनकी मानसिक स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं।

Categories: देश,लेख

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