लोकसभा और राज्य सभा की दिल्ली में 10 सीटें हैं दलित के लिए 1 सुरक्षित लेकिन मुसलमान के लिए क्यों नहीं?


डी.सी. कपिल
नई दिल्ली। दिल्ली मे लोकसभा की एक उत्तर पश्चिम दिल्ली की सीट सुरक्षित है। इस सीट पर दलित प्रत्याशी उतारना हर पार्टी की संवैधानिक एवं सियासी मजबूरी है। सवाल ये है कि दिल्ली की इन 10 सीटो मे से एक भी सीट मुस्लिम समाज को किसी भी पार्टी ने नही दी है। आखिर क्यो? ओर कोई दे या न दे मगर उस आम आदमी पार्टी को तो जिसे मुस्लिमो और दलितो ने एक तरफा वोट किया था। उस पार्टी को कम से कम एक या दो सीट मुस्लिम समाज को जरूर देनी चाहिए थी। मगर ऐसा नही हो रहा है। इस पार्टी ने भी अन्य सियासी दलों की भांति दिल्ली मे 20% मुस्लिम आबादी को ठेंगा दिखा दिया है। जो गलत है। वही 10 मे से 5 सीटे बनियो को देकर फिर साबित कर दिया है कि ये भी एक जातिवादी पार्टी ही है।
उल्लेखनीय है कि दलित मुस्लिम युनाईटेड मोर्चा ने इस मुद्दे को आम आदमी पार्टी से हक मांगने के लिए तीन पत्र दिल्ली के मुख्यमंत्री को लिखे थे। मगर आप मुखिया अरविन्द केजरीवाल ने भी उक्त पत्रों का जवाब देना मुनासिब नहीं समझा। केजरीवाल कि ख़ामोशी का यही मतलब निकलता हे कि वो भी अन्य सियासी जमातों की तरह मुसलमानो को उनका सियासी हक़ नहीं बल्कि भाजपा का भय दिखाकर अपना गुलाम बनाना चाहते हैं।
ये सच है कि दिल्ली मे भाजपा को हराने मे अहम रोल आपका है। मगर इसका अर्थ ये कतई नही है कि दिल्ली के मुसलमानो को सिर्फ इसलिए ब्लैकमेल किया जाए कि भाजपा को हराने के लिए आम आदमी पार्टी को वोट तो दे मगर अपनी हिस्सेदारी न मांगे। आखिरकार इस देश का मुसलमान भाजपा को हराने के लिए कब तक इस्तेमाल होता रहेगा? अपना हक मांगने के लिए भी कभी जुबान खोलेगा या नही?
दिल्ली के मुस्लिम मतदाताओं को आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविन्द केजरीवाल व कांग्रेस पार्टी के मुखिया राहुल गांधी से पूछना चाहिए कि हमारे वोटों के बदले क्या हमें सत्ता में भागीदार बनाओगे? सत्ता में भागीदारी के लिए लोकसभा की 07 में से कितने मुस्लिम को सांसद, 70 दिल्ली विधानसभा में से कितने मुस्लिम को विधायक और 272 निगम चुनावों में से कितने मुस्लिम को निगम पार्षद की टिकट दोगे? फिर आप देखना सभी अपनी-अपनी बगलें झांकते नज़र आयेंगे l जब ये लोग आपको सत्ता में भागीदार नही बना सकते हैं तो फिर इनको वोट क्यों? ये तो सिर्फ मुस्लिम वोटों के ठेकेदार बनते है, जो हमारे वोटों का ठेका लेना चाहते हैं। अब सवाल यह है कि जब मुसलमानो को सियासत में भागीदारी नहीं देना चाहते हो तो फिर मुसलमान तुम्हारा झंडा क्यों उठायें? और क्यों तुम्हें वोट दें? मुसलमानो ]को चाहिए कि कम से कम इनसे अपनी आबादी के प्रतिशत के हिसाब से टिकटें मांगें, तभी इनका डंडा-झंडा उठायें l अरविन्द केजरीवाल ने जो किया वह सबके सामने है, मुसलमानो के वोट लेकर सरकार तो बना ली। मुसलमानो को राजयसभा में दिखाया ठेंगा और अपनी बिरादरी के एक नही दो-दो लोगों को राज्यसभा भेज दिया, ऐसा क्यों]? किसी मुस्लिम को क्यों नही?
अब सवाल यह भी है कि अगर इस मांग पर आप और कॉंग्रेस दोनों ही पार्टियों ने मना कर दिया तो फिर मुसलमानो को क्या करना चाहिये? उम्मीद यही है कि दोनों ही सियासी पार्टियां हिस्सेदारी देने से बचेंगीं। अपनी सामाजिक भागीदारी को सामने रखकर और ठोक बजाकर दिल्ली की सडको पर अब मुसलमानो को उतर जाना चाहिए। दलित और मुस्लिम मिलकर सत्ता का विकल्प तलाशें।


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