फिर सेना की भावना भी बन जायेगी ज्वालामुखी


राष्ट्र-चिंतन

फिर सीमा पर सेना जान दे क्यों 

विष्णुगुप्त

पंजाब सरकार के मंत्री, पूर्व क्रिकेटर और हसोड कलाकार नवजीत सिद्धु की पाकिस्तान यात्रा और पाकिस्तान के सेना प्रमुख बाजवा से गले मिलने पर हंगामा मचना स्वाभाविक है। राष्ट्रवादी तो नाराज हैं ही, इसके अलावा पंजाब के कांग्रेसी भी कम नाराज नहीं हैं। सबसे बडी बात यह है कि यह नाराजगी पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिन्दर सिंह तक पहुंच चुकी है। अमरिन्दर सिंह का कहना है कि सिद्धु को पाकिस्तान सेना प्रमुख से गले नहीं मिलना चाहिए था, सीमा पर हमारे सैनिक रोज मर रहे हैं, इसे देखते हुए पाकिस्तान के सेना प्रमुख से इस तरह से गले मिलना गैर जरूरी था। सिद्धु के इस कदम के खतरे को राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस पहचान नहीं सक रही है और न ही इसके संदेश को समझ पा रही है पर पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिन्द्रर सिंह सिद्धु के इस कदम के खतरे और सिद्धु के इस कदम के संदेश को जरूर समझ रहे हैं। कहना न होगा कि खतरे को भांप कर ही अमरिन्दर सिंह को मुंह खोलना पडा है।

यह कौन नहीं जानता है कि सेना में सर्वाधिक पंजाबी हैं, सिख रेजिमेंट नाम की एक बटालियन है, सिख बटालियन की देशभक्ति और वीरता सर्वश्रेष्ठ रही है। पंजाब के शहीद सैनिकों के कई पीडित भी सिद्धु के खिलाफ आगे आये हैं। निश्चित तौर पर इस गले लगने की घटना ने सेना की भावनाओं को चोट पहुंचायी है, वैसे परिवारों को दुख पहुंचाया है जिनके परिजन पाकिस्तान की सैनिकों और पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से लडकर शहीद हुए हैं। सेना के बीच भी यह भावना बढ रही है कि हमारे देश के शासक और सेलिब्रिटी अगर पाकिस्तान के साथ दोस्ती का खेल-खलेंगे, क्रिकेट खेलेंगे, चिकेन बिरयाणी की कूटनीति और फैशन का परैड करेंगें तो फिर सेना सीमा पर पाकिस्तानी सैनिकों की गोलियां खाकर देश की सुरक्षा क्यों करेगी? खुशी की बात है कि हमारी सेना दुनिया की सर्वाधिक अनुशासित और नियंत्रित है। पर धीरे-धीरे शासकों और सेलिब्रिटियों की ऐसी करतूतों से सेना का मनोबल क्यों और कैसे नहीं टूट सकता है?

सिर्फ सिद्धु की ही बात नही हैं, सिर्फ सिद्धु ही सेना की भावनाओं को नजरअंदाज करने का दोषी नहीं है? इतिहास उठा कर देख लीजिये। कठघरे में कई और भी होंगे। सच तो यह है कि सत्ता बदलती है पर सत्ता की सोच नहीं बदलती। नरेन्द्र मोदी से लेकर मनमोहन सिंह तक कठघरे में खडा होंगे। पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने मनमोहन सिंह को ‘ देहाती औरत‘ कहा था, देहाती औरत का अर्थ चुगल खोर औरत से है, फिर भी मनमोहन सिंह की वीरता नहीं जगी थी, सीमा पर सैनिकों के सिर काटे जा रहे थे फिर भी मनमोहन सिंह विदेशी दौरों पर नवाज शरीफ से गले लगना नही भूलते थे। मनमोहन सिंह का पतन हुआ और देश की सत्ता पर नरेन्द्र मोदी का राज कायम हुआ। फिर भी कुछ नहीं बदला। जब नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नहीं बैठे थे तब खूब दहाडते थे, कहते थे कि मेरे पास 56 इंच का सीना है, हम पाकिस्तान को जैसे के तैसे में ऐसा जवाब देंगे कि फिर कभी पाकिस्तान भारत के खिलाफ आंख उठा कर नहीं देखेगा। यह दहाड हवाहवाई साबित हुआ। पाकिस्तान की कारस्तानी नहीं बदली, पाकिस्तान की आतंकवादी सोच जारी रही। सीमा पर भारतीय सैनिकों की जान जाती रही।

एक दिन देश को अंचभित करते हुए नरेन्द्र मोदी पाकिस्तान पहुंच गये, नवाज शरीफ से मिल आये। नरेन्द्र मोदी नवाज शरीफ से जरूर मिल आये, नवाज शरीफ को जरूर गले लगा लिये पर सीमा पर पाकिस्तान की कारस्तानी नहीं बदली। सीमा पर पाकिस्तानी सैनिकों की करतूत जारी रही, कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद पहले की तरह जारी है। कभी अटल बिहारी वाजपेयी ने भी गले लगने और पाकिस्तान को बदलने की सोच और खुशफहमी रखी थी। समझौता बस लेकर लाहौर गये थे जहां पर पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ ने सलामी न देकर वाजपेयी को अपमानित किया था। फिर भारत के पीठ में छुरा घोपते हुए पाकिस्तान ने कारगिल हमला कर दिया, घुसपैठियों का हथकंडा बना कर पाकिस्तानी सेना कारगिल पर कब्जा जमा बैठी। कारगिल को मुक्त कराने में हमारे हजारों वीर सैनिकों को जान देनी पडी थी। कारगिल हमले के लिए परवेज मुशर्रफ को दोषी ठहराया गया था। पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने कहा था कि कारगिल हमला उनकी सरकार की नहीं बल्कि परवेज मुशर्रफ की व्यक्तिगत कारास्तानी थी।

दुनिया में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलेगा जब किसी हमलावर या फिर अपने हजारों सैनिकों के बलिदान के दोषी को गले लगाया जाये। परवेज मुशर्रफ हमारे हजारों सैनिको के बलिदान का खलनायक था। परवेज मुशर्रफ को गले लगाना हजारों बलिदान सैनिकों का अपमान था। पर हमारी सत्ता कारगिल के वीर और बलिदानी सैनिकों का सम्मान भूल गयी। चरणवंदना के लिए परवेज मुशर्रफ को आगरा आमंत्रित किया जाता है। आगरा में परवेज मुशर्रफ का सम्मान होता है। यह अलग बात है कि आगरा में मुशर्रफ की दाल गली नहीं थी। आगरा में परवेज मुशर्रफ की दाल क्यों नहीं गली थी, यह भी एक विचारणीय विषय है। उस समय लाल कृष्ण आडवाणी की वीरता जगी थी और परवेज मुशर्रफ को खाली हाथ वापस लौटना पडा था। मनिशंकर अय्यर जैसे लोग पाकिस्तान जाकर भारतीय सेना को खलनायक और भारतीय सरकार को हिंसक बताना नहीं चुकते हैं। देश के अंदर में कई एनजीओ और कई अन्य संगठन ऐसे हैं जो पाकिस्तान जाकर भारतीय सेना की भावनाओं को कुचलते रहे हैं। तथाकथित सेक्युलर और तथाकथित उदारवादी लोग भारतीय तिरंगा झंडा से नफरत करते हैं पर पाकिस्तानी झंडे के नीचे खडे होकर फोटो खिंचचाने में गर्व महसूस करते थे। कुछ साल पहले तक भारतीय बुद्धिजीवी अमेरिका जाकर भारतीय सेना और भारतीय गुप्तचर एजेंसियों को हिंसक कहना न भूलते थे। उन पर पाकिस्तानी करैंसी सर चढ कर बोलती थी। ऐसे भारतीय बुद्धिजीवियों के प्रायोजक आज कल अमेरिकी जेलों में बंद हैं, अमेरिका ने उस प्रायोजक को अमेरिकी कानून तोडने के आरोप में जेल में बंद कर रखा है।

इस बात को कौन अस्वीकार कर सकता है कि पाकिस्तान हमारा दुश्मन देश है, हम लाख कोशिश कर लें पर न तो दुश्मन देश की सोच बदलती है और न ही उसकी आतंकवादी कारस्तानी बदलती है। भारत की बात छोड दीजिये। पूरी दुनिया पाकिस्तान को सुधारने में लगी थी, पूरी दुनिया पाकिस्तान को सुधारने में असफल साबित हुई है। अमेरिका और यूरोप ने पाकिस्तान की आतंकवादी नीति को जमींदोज करने के लिए अरबों डालर खर्च कर दिये, पर परिणाम कुछ भी नहीं निकला। पाकिस्तान कहता रहा था कि ओसामा बिन लादेन उसके यहां नहीं है और  न ही उसका ओसामा बिन लादेन से कोई लेना-देना है। अमेरिका पाकिस्तान के अंदर ही ओसामा बिन लादेन को मार गिराता था।

भारत के शासक और भारत की सेलिब्रिटी यह सोचती है कि गले मिलने और फेज थ्री टाइप के सेमिनारों के माध्यम से भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती सुनिश्चित हो जायेगी? यह एक बडी खुशफहमी है। पाकिस्तान के लोकतांत्रिक शासन की कोई औकात नहीं होती है, लोकतांत्रिक शासक तो नाम मात्र का शासक होता है। असली शासक तो सेना होती है। सेना ने ही नवाज शरीफ को हरवाया है। सेना और न्यायापालिका ने चुनाव से ठीक पहले हाथ मिला लिये और नवाज शरीफ को जेल में डाल दिया गया। ऐसा क्यों किया गया? सेना ने यह खेल नवाज शरीफ से मुक्ति के लिए खेला था जिसने सेना को आंख दिखाने की कोशिश की थी।

दुनिया यह जानती है कि इमरान खान की अपनी कोई औकात नहीं है, उसके पास बहुमत भी नहीं है। इमरान की लगडी सरकार है। सेना कठपुतली की तरह इमरान खान को नचायेगी। इमरान खान भी सेना और आतंकवादियों के विश्वास पर प्रधानमंत्री बने हुए हैं। इसलिए यह उम्मीद नहीं है कि इमरान खान आतंकवाद और हिंसा रोक देंगे। जब आतंकवाद और हिंसा नहीं रूकेगी तो फिर भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती कैसे संभव होगी? असली प्रश्न यही है।

भारतीय शासकों और भारतीय सेलिब्रिटियों की तरह ही भारतीय सेना भी पाकिस्तान के साथ दोस्ती का खेल-खेलने लगेगी तो फिर भारत की सुरक्षा संभव हो सकती है? कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद पर अंकुश लगाया जा सकता है। आज भी सीमा पर पाकिस्तान सैनिक बार-बार उकसावे की कार्यवाही कर रहे हैं, भारतीय सैनिक रोज शहीद हो रहे हैं ऐसे में सिद्धु टाइप की दोस्ती संस्कृति खतरनाक है। सेना की भावनाओं के साथ देश को चलना होगा। नही ंतो फिर एक न एक दिन सेना की भावना भी ज्वालामुखी बन सकती है?


Categories: राजनीति,लेख

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